बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद सड़कों पर जो जश्न दिख रहा है, वह सिर्फ एक पार्टी की जीत का जश्न नहीं लग रहा।
ऐसा लग रहा है जैसे बहुत दिनों से दबे हुए लोग अचानक खुली हवा में आ गए हों। जैसे किसी ने बरसों बाद घर की बंद खिड़की खोली हो और भीतर पहली बार हवा आई हो।
चुनाव देश में पहले भी हुए हैं।
सरकारें पहले भी बदली हैं।
नेता पहले भी हारे हैं, नेता पहले भी जीते हैं।
लेकिन बंगाल में इस बार जो माहौल है, वह अलग है। यह सिर्फ ढोल, अबीर, लड्डू और नारे वाला जश्न नहीं है। यह उस आदमी की मुस्कान है, जो बहुत दिनों से भीतर ही भीतर दांत भींचकर बैठा था। यह उस परिवार की राहत है, जिसने राजनीति को बहस नहीं, जोखिम की तरह जिया।
बंगाल की सड़कें जैसे कह रही हैं, “भइया, बात सिर्फ सरकार बदलने की नहीं थी। बात डर बदलने की थी।”
कई सालों से बंगाल के बहुत हिस्सों में राजनीति सामान्य लोकतांत्रिक मुकाबला नहीं रह गई थी। किसने किसको वोट दिया, किसने किसका झंडा लगाया, किसने किस नेता की पोस्ट शेयर कर दी, किसने किसके खिलाफ मुंह खोल दिया, इन छोटी-छोटी बातों पर भी आदमी को सोचकर चलना पड़ता था।
लोकतंत्र में वोट डालकर आदमी घर लौटे तो उसे चैन से चाय पीनी चाहिए।
यह नहीं सोचना चाहिए कि शाम को दरवाजे पर कौन आ जाएगा।
बुजुर्ग लोग कहते हैं, “जिस घर में रोज डर की कुंडी खटके, वहां आदमी सोता नहीं, बस रात काटता है।”
बंगाल के बहुत से लोगों ने राजनीति को ऐसे ही रात काटने की तरह जिया।
2021 की हिंसा की याद आज भी बहुत घरों में ताजा है। Sandeshkhali की आवाजें लोगों ने सुनीं। स्थानीय दबंगई, कटमनी, धमकी, मारपीट, विरोधी कार्यकर्ताओं पर हमले, इन सबने आम आदमी के मन में एक बात बैठा दी थी कि सत्ता से टकराना आसान नहीं है।
टीवी पर सब सामान्य दिखता था।
नेताओं के भाषण सामान्य लगते थे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस सामान्य चलती थीं।
लेकिन नीचे जनता का मन सामान्य नहीं था।
गांव के आदमी को पता था कि बोलने की कीमत होती है। मोहल्ले के आदमी को पता था कि पोस्टर लगाने की कीमत होती है। कार्यकर्ता को पता था कि झंडा उठाने की कीमत होती है। और परिवार को पता था कि राजनीति कभी-कभी घर की शांति तक खा जाती है।
कहते हैं, “चुप आदमी को हल्का मत लो, वह भीतर पूरी कचहरी लगाए बैठा होता है।”
बंगाल की जनता ने भी भीतर कचहरी लगा रखी थी।
इस बार फैसला सुना दिया।
इसलिए आज बंगाल में जो लोग सड़क पर हैं, उन्हें सिर्फ “जीत का जश्न” कहकर समझना मुश्किल है।
वे सिर्फ BJP की जीत नहीं मना रहे।
वे उस डर की हार मना रहे हैं, जो कई सालों से उनके दरवाजे पर बैठा था।
जब कोई आदमी बहुत दिन तक चुप रहता है, तो उसका पहला बोलना थोड़ा ऊंचा ही निकलता है।
बंगाल आज वही ऊंची आवाज़ है।
कहीं ढोल बज रहा है।
कहीं अबीर उड़ रहा है।
कहीं मिठाई बंट रही है।
कहीं लोग बस खड़े होकर मुस्कुरा रहे हैं।
पर असली जश्न चेहरे पर है।
वह चेहरा कह रहा है, “अब बात कहने से पहले चार बार इधर-उधर नहीं देखना पड़ेगा।”
वह चेहरा कह रहा है, “अब वोट हमारा था, रहेगा भी हमारा।”
वह चेहरा कह रहा है, “अब बंगाल सिर्फ सत्ता का नहीं, जनता का भी है।”
किसी भी राज्य में सत्ता बदलना बड़ी बात होती है।
लेकिन सत्ता से डर उतरना उससे भी बड़ी बात होती है।
बंगाल में इस बार जनता का जश्न इसलिए इतना गहरा लग रहा है क्योंकि यह खुशी अचानक पैदा नहीं हुई। यह वर्षों की चुप्पी से निकली है। यह उन घरों से निकली है जहां लोग राजनीतिक चर्चा धीमी आवाज़ में करते थे। यह उन बूथों से निकली है जहां वोट सिर्फ अधिकार नहीं, हिम्मत का काम बन गया था।
लोग पूछ रहे हैं, “इतना जश्न क्यों?”
अरे साहब, जब आदमी सिर्फ जीतता है तो मिठाई बांटता है।
जब आदमी डर से बाहर आता है तो सड़क पर उतरता है।
बंगाल आज सड़क पर इसलिए है।
पुरानी बात है, “रस्सी में बंधा बैल खुलते ही खेत नहीं जोतता, पहले गर्दन हिलाता है।”
बंगाल की जनता भी आज वही गर्दन हिला रही है।
बहुत दिन तक चुप रही।
बहुत दिन तक देखती रही।
बहुत दिन तक सहती रही।
बहुत दिन तक मन में हिसाब रखती रही।
अब जब मौका आया, तो उसने EVM में सिर्फ वोट नहीं डाला।
उसने डर के माथे पर ठप्पा लगा दिया।
यह जश्न किसी नेता के पोस्टर से बड़ा है।
यह किसी पार्टी कार्यालय से बड़ा है।
यह किसी विजय जुलूस से बड़ा है।
क्योंकि इसमें आम आदमी की सांस शामिल है।
और आम आदमी जब सच में सांस लेता है, तो आवाज़ दूर तक जाती है।
बंगाल आज कह रहा है कि लोकतंत्र सिर्फ कागज पर नहीं होता।
लोकतंत्र तब होता है जब आदमी बिना डरे वोट दे सके।
बिना डरे बोल सके।
बिना डरे झंडा लगा सके।
बिना डरे अपने दरवाजे पर खड़ा हो सके।
आज बंगाल में अबीर सिर्फ हवा में नहीं उड़ रहा।
लोगों के भीतर जमा डर भी उड़ रहा है।
बाकी ढोल तो बहाना है भइया।
असली आवाज़ बंगाल के आम आदमी के सीने से आ रही है।
और वह आवाज़ साफ है।
“अब बहुत हुआ। अब बंगाल जनता का है।”.
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